किसानों की आत्महत्या में गड़बड़झाला कर रही मोदी सरकार

ये बात तो आपने खूब सुनी होगी कि आज की दुनिया में डेटा का बहुत महत्व है, लेकिन ये सब बातें भारत में किताबी ही लगती हैं. खासतौर से मोदी सरकार में. हम बात कर रहें हैं किसानो की आत्मह्त्या के आंकड़ो के बारे में जिसका आंकड़ा मोदी सरकार के पास है ही नही. बता दें कि संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के सांसदो ने मोदी सरकार से संसद में कुछ जानकारियां मांगी थी लेकिन सरकार का कहना है कि हमारे डेटा ही उपलब्ध नही है. सरकार के पास डेटा क्यों उपलब्ध यह प्रश्न उठना तो लाजमी है. 21 सितंबर को राज्यसभा सांसद पीएल पुनिया ने गृह मंत्रालय से किसानो की आत्महत्या को लेकर सवाल पूछा. लेकिन जवाब उम्मीद के मुताबिक मिलना मोदी सरकार में तो मुमकिन ही नही है. गृह राज्यमंत्री किशन रेड्डी ने बताया कि NCRB ने कई बार राज्यों से किसानों और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या की जानकारी मांगी, लेकिन राज्य सरकारों ने आंकड़े बताए ही नही. इस वजह से कृषि क्षेत्र में किसानो की आत्महत्या के कारणों का पता न चल पाने से उनके आंकड़े प्रकाशित ही नही किए गए. ये बातें तो कृषि राज्यमंत्री का कहना है. अब अगर नजर डाले NCB के आंकड़ो पर तो पता चलता है कि 2014 में 12,360, 2015 में 12,602 और 2016 में 11,379 किसानो ने मौत को गले लगाया था. आपको जानकर हैरानी होगी कि 2016 के बाद NCB ने किसानो की आत्महत्या का डेटा सार्वजनिक ही नही किया. अगर देखा जाए महाराष्ट्र में हर साल पानी की समस्या आती है और वहां सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या करते हैं. 2019 में PTI की रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार में हर दिन किसान आत्महत्या करते हैं.

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